चातुर्मास कलश स्थापना समारोह संपन्न, चार माह तक बहेगी धर्म-ज्ञान की अनवरत गंगा

संवाददाता : मनोज कुमार
जसवंतनगर। परम पूज्य मुनि श्री 108 भावसागर महाराज के चातुर्मास वर्षायोग का कलश स्थापना समारोह रविवार सायंकाल श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रांगण में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने कलश स्थापित कर गुरुदेव से आगामी चार माह तक नगर में धर्म, ज्ञान और अध्यात्म की अनवरत गंगा प्रवाहित करने का निवेदन किया।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मुनि श्री के सान्निध्य में होने वाले प्रवचन, स्वाध्याय एवं धार्मिक आयोजनों से समाज का आध्यात्मिक उत्थान होगा। चातुर्मास के दौरान स्थापित कलशों की प्रतिदिन मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी तथा वर्षायोग पूर्ण होने के उपरांत श्रद्धालु इन्हें अपने घरों में स्थापित करेंगे।

कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण, मंत्रोच्चार एवं ध्वजारोहण के साथ हुआ। महेशचंद जैन, पंकज जैन एवं नीरज जैन ने ध्वजारोहण किया। इसके पश्चात आचार्य श्री 108 शांतिसागर महाराज के चित्र का अनावरण भट्टारक सौरभ सेन जी द्वारा किया गया। विनोद जैन एवं विनीत जैन परिवार ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
गुरुदेव मुनि श्री 108 भावसागर महाराज का पाद-प्रक्षालन लुधुपुरा निवासी अनीता जैन एवं रजत जैन परिवार द्वारा किया गया। वहीं लीलावती, कुमदेश, विनोद एवं मनोज परिवार ने भोजन व्यवस्था में सहयोग प्रदान कर गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया।
कार्यक्रम के दौरान नन्हे-मुन्ने बच्चों ने मंगल गीतों पर आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर सभी का मन मोह लिया। चातुर्मास के प्रथम कलश की स्थापना का सौभाग्य नलिन, अनिल एवं नितिन जैन को प्राप्त हुआ। द्वितीय कलश रोहित जैन ‘फड्डू’, तृतीय कलश मनोज प्रखर जैन, चतुर्थ कलश आशीष जैन तथा पंचम कलश राजकमल जैन द्वारा स्थापित किया गया।

गुरुदेव को नवीन पिच्छी अर्पित करने का सौभाग्य अतुल गुप्ता ‘लाला भट्टा’ को प्राप्त हुआ। उन्होंने भक्तिभाव एवं उत्साह के साथ नृत्य करते हुए गुरुदेव को पिच्छी समर्पित की। पूरा वातावरण भक्ति, संगीत और आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर रहा।
इस अवसर पर अहमदाबाद से पधारी उषा दीदी ने कहा कि मुनि श्री 108 भावसागर महाराज अत्यंत सरल, विद्वान एवं योगी संत हैं। उन्होंने शिखरजी में अनेक मुनियों को अध्ययन कराया है। आगम आधारित उनका स्वाध्याय तथा जैन धर्म के सिद्धांतों पर उनकी गहन एवं प्रेरणादायक व्याख्या समाज को नई दिशा प्रदान करती है।
अपने प्रवचन में मुनि श्री 108 भावसागर महाराज ने कहा, “मैं यहां किसी मंदिर या धर्मशाला का निर्माण कराने नहीं आया हूं। मेरा उद्देश्य जैन को जैन से जोड़ना है। मैं यहां आत्मा को परमात्मा से मिलाने का माध्यम बनकर आया हूं। यदि समाज धर्म, स्वाध्याय और आत्मचिंतन से जुड़ेगा, तभी जीवन का वास्तविक कल्याण संभव होगा।”
यह समारोह श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा के वातावरण में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे।




